Home राज्य हरयाणा वो गांव का बचपन और सावन के झूले, कहीं दादी और नानी की कहानी न बन जाएं

वो गांव का बचपन और सावन के झूले, कहीं दादी और नानी की कहानी न बन जाएं

18 second read
0
1
589

हेमराज बिरट, तेज़ हरियाणा नेटवर्क:



बड़े-बड़े पेड़ों पर मोटे रस्से से पड़े झूले और लोगों की टोलियां झूले का आनंद लेते थी। झूले को झोंका देते हुए महिलाएं गीत गाती थी और हल्की बारिश की फुहारों में झूले पर लंबी-लंबी पींग बढ़ाकर झूले को तेज करते हुए पेड़ों की शाखाओं को छू लेना बड़ा ही सुखद मंजर था। बच्चे-बूढ़े और जवान अपने-अपने हमउम्र साथियों के साथ पूरे सावन माह का भरपूर आनंद लिया करते थे। ऐसा हुआ करता था पुराने जमाने सावन का महीना। वो झूले, मल्हार, सखा सहेलियों का बचपन सबकुछ ओझल सा हुआ जा रहा है। अब लोगों को पता ही नहीं चलता कि सावन कब आकर गुजर जाता है। अब वही बचपन आधुनिक खेलों में उलझकर रह गया है। इंसान की जिंदगी इतनी व्यस्त हो गई है कि उसे अब इन चीजों की परवाह नहीं रहती। इंसान ने अपनी सारी जिंदगी खेलकूद और मोबाइल तक ही सीमित कर ली है। इस तरह सावन के झूले भी अपना अस्तित्व खो रहे हैं।

-कुछ इस तरह होता था सावन के झूले का आनंद:
ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 15-20 वर्ष पूर्व लोग सावन माह का इंतजार करते थे। माह के शुरुआत में ही गांव-गांव में पेड़ों पर रस्सी के सहारे सावन के झूले डाले जाते थे। जहां पर सैकड़ों लोगों का जनसमूह एकत्र होता था। इसके बाद अपनी-अपनी बारी का इंतजार करके लोग उस झूले का आनंद लेते थे। कभी-कभी तो ऐसा होता था कि सावन के मौके पर इस रस्सी के झूले पर एक से लेकर 5 लोग एक साथ बैठकर झूले का आनंद लेते थे। सौहार्द और प्रेम के भाव से ओतप्रोत वह जनसमूह सावन के माह में देखने को मिलता था, लेकिन आज के समय में पहले जैसा माहौल देखने को नहीं मिलता। अब गांव के बड़े-बड़े पेड़ों के झूलों की परंपरा घरों के छत या बीम के कुंडे में सिमटकर रह गई है।

-स्मार्टफोन में सिमटकर रह गया सावन:
आज बच्चों की जिद पर घर में छोटे झूले डाल दिये जाते हैं। इस तरह नन्हे-मुन्ने बच्चे ही इस परंपरा का अस्तित्व बचाए हुए हैं। सच कहा जाए तो अब झूले को लोग बच्चों का खेल समझते हैं। दरअसल इस भागदौड़ की जिंदगी में लोग व्यस्त हो गए हैं। इसका सीधा असर बच्चों पर पड़ता है। इन परंपराओं से अनभिज्ञ बच्चे भी अब ज्यादातर समय स्मार्टफोन के गेम खेलने में व्यतीत करते हैं। सावन के झूलों की बस यादें ही रह गई। संयोगवश कहीं-कहीं गांव में आज आपको सावन के झूले दिख जाएंगे, लेकिन उन झूलों के आसपास छोटे-छोटे बच्चों की टोलियां दिखती हैं। क्योंकि इन झूलों का आनंद अब बड़े लोग नहीं उठाते। जिस तरह झूलों की परंपरा विलीन होती जा रही है। ऐसे तो कुछ वर्षों बाद सावन और झूले महज कहानी बनकर रह जाएंगे। राजा-रानी की तरह दादी और नानी आने वाली पीढ़ियों को झूलों की कहानी सुनाया करेंगी।

Leave a Reply

Check Also

ऐलनाबाद से पवन बेनीवाल ने बीजेपी को बोला अलविदा

ऐलनाबाद विधानì…